एक था राजा, एक थी दासी 11

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लेखिका – तेजस्विनी
सम्पादिका – मस्त कामिनी

जब रात्रि काल में, वक्षकुमारी उत्सव के लिए निकली तो दोनों डाकुओं ने जो अब अंगरक्षक थे, अपने साथियों को इशारा कर दिया।

अब बस दासी रूपाली को, वक्षकुमारी के पास से सारे पहरेदार हटाने थे और जब राजकुमारी उत्सव में पहुँची तो दासी रूपाली उनके साथ ही खड़ी हो गई और फिर उसने धीरे से एक अंगरक्षक से कहा की मैं पहरेदारों को यहाँ से हटाकर, इशारा करूँगी… !! तभी तुम, राजकुमारी का अपरहण कर लेना… !!

उसने हाँ में सिर हिला दिया और फिर, रूपाली बहाने से एक एक कर हर पहेरेदार को वहाँ से हटाती रही और फिर अंत में, जब कोई पहरेदार राजकुमारी के आस पास नहीं बचा तब रूपाली ने दोनों अंगरक्षकों को इशारा कर बता दिया की कोई पहरेदार अब रूपाली के पास नहीं है।

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इशारा मिलते ही, एक अंगरक्षक ने तुरंत ही बेहोशी की दवाई के कपड़े से राजकुमारी का मुंह दबा दिया।

राजकुमारी चिल्ला पाती, उससे पहले वो बेहोश हो गई और फिर दोनों अंगरक्षकों ने चुपके से राजकुमारी की जगह एक राजकुमारी के समान वस्त्र पहना हुआ, पुतला बिठा दिया।

फिर, चुपके चुपके दोनों वक्षकुमारी को उत्सव से बाहर ले आए और फिर दोनों ने एक बैलगाड़ी में राजकुमारी को लेटा दिया और बैलगाड़ी चलाते हुए, योनपुर की सीमा पर आ गये।

वहाँ पर, गुप्तचर और दो डाकू उन दोनों का इंतेज़ार कर रहे थे।

गुप्तचर ने, दोनों डाकुओं को शाबाशी देते हुए कहा – अब तुम लोग, घोड़े पर चलो… !! बैलगाड़ी, मैं लेकर आता हूँ… !!

फिर गुप्तचर ने बैल की लगाम अपने हाथ में ली और अंधेरे जंगल में चल दिया और फिर वो सब एक गुफा के पास आकर रुके और फिर गुप्तचर ने वक्षकुमारी को अपनी गोद में उठाकर, गुफा के अंदर ले गया और उन्हें एक खंभे से बाँध दिया।

गुप्तचर ने सोचा की अगर, वो महाराज को योजना के सफल होने का समाचार देने गया तो पता नहीं पीछे से यह चारों डाकू राजकुमारी के साथ कुछ कर ना दे.. इसलिए, उसने थोडा सोचा और फिर एक डाकू की और इशारा कर बोला की जाओ, तुम जाकर महाराज को बताओ की योजना सफल रही… !!

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डाकू क्या करता, वो चल दिया राजा को सूचना बताने।

जब डाकू ने राजा को यह सूचना दी तो राजा फूला ना समाया..

उसने तुरंत, वक्षकुमारी को देखने की इच्छा प्रकट की और इधर रूपाली ने योजना अनुसार, नगर में हल्ला मचा दिया की राजकुमारी का अपरहण हो गया है।

वहाँ योनपुर के महाराज को जब यह सूचना मिली तो वो स्तब्ध रह गये और राजकुमारी की मां, फुट फुट के रोने लगी।

योनपुर के महाराज ने, तुरंत अपने सैनिकों और गुप्तचरों को, वक्षकुमारी की तलाश में लगा दिया और साथ ही, गुप्तचरों से कहा की वो पड़ोसी राज्य के राजाओ को खबर दे दें और उनसे हमारी मदद के लिए प्राथना करें।

उधर, राजा लिंगवर्मा उस गुफा के पास पहुँचा, जहाँ डाकुओं ने वक्षकुमारी को रखा था।

वो जब अंदर गया, तब राजकुमारी को बँधा देख उसे बड़ी खुशी हुई.. मगर, राजकुमारी तब भी बेहोश थी..

फिर, राजा ने गुप्तचर को बुलाकर उसके काम के लिए शाबाशी दी और उसे 1000 स्वर्ण मुद्रा भेंट करीं.. जो उसके और उसके साथी डाकुओं के लिए, इनाम था..

अब उसने गुप्तचर से कहा की राजकुमारी, बिलकुल ठीक है ना… !!

तो गुप्तचर ने बताया – हाँ, महाराज… !! राजकुमारी, बिलकुल ठीक हैं… !! बस, बेहोश हैं… !! कुछ देर में, होश में आ जाएँगी… !!

उसने कहा की ठीक है, अब आप लोग राजकुमारी के सारे वस्त्र उतार कर, उन्हें नग्न कर दें और उनको चोदने के सिवा जो करना चाहें, वो आप उनके साथ कर सकते हैं… !!

यह सुन, गुप्तचर और डाकू चौंक गये..

तब गुप्तचर ने कहा – महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं… !! यह तो, हमारी होने वाली महारानी हैं और हम कैसे इन्हें नग्न कर सकते हैं… !!

तब राजा ने, नाराज़ होते हुए कहा – गुप्तचर, आप से जितना कहा है, उतना करें… !! बस, ध्यान रहे की आप में से कोई उन्हें चोदेगा नहीं, समझे की नहीं… !!

बिचारा गुप्तचर क्या करता, उसने हाँ में सिर हिलाते हुए कहा – जैसी आपकी आज्ञा, महाराज… !!

जल्द ही, पेश करुँगी इस कहानी का अगला भाग..

आपकी गीली चूतों और खड़े लण्डों को मेरा सलाम.. ..

आपकी तेजस्विनी.. .. ..

Written by

मस्त कामिनी

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